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Sunday, March 1, 2020

Eklavya Story - एक सुरवीर

Eklavya Story - एक सुरवीर

Eklavya-Story

Eklavya Story

Eklavya Story बहुत प्राचीन समय की बात हैं जब गुरुकुल का सिधांत माना जाता था | जहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिये शिष्यों को गुरु के आश्रम में रहना पड़ता था | सभी शिष्य एक साथ गुरु एवं उनके पुरे परिवार के साथ शिक्षा प्राप्त करते एवम जीवनव्यापन करते थे | यह बात उस समय की हैं जब शिक्षा भी कूल देखकर दी जाती थी जैसे युध्द एवम शास्त्रों का प्रशिक्षण केवल उच्च कुलीन क्षत्रिय एवम ब्राह्मण कुल के शिष्य ले सकते थे | उसी समय एक होनहार शिष्य का नाम विख्यात हुआ जिन्होंने बिना गुरु के उस शिक्षा को प्राप्त किया जिसे गुरु के सानिध्य में भी कोई प्राप्त नहीं कर पाया था वो प्रख्यात शिष्य था Eklavya, जो अपनी कला से ज्यादा अपनी गुरु दक्षिणा के लिये जाना जाता हैं | आइये जाने विस्तार से Eklavya की कहानी:
बहुत पुरानी घटना हैं | लगभग पाँच हजार वर्ष पुरानी, जब भारत में कुरु वंश का शासन बहु चर्चित था | उन दिनों एक भील बालक था जिनका नाम Eklavya था वो भीलों के राजा का पुत्र था | Eklavya एक सुंदर गठीले बदन वाला एक होनहार बालक था | और अपनी उम्र के बालको से बहुत भिन्न था | छोटी उम्र से ही उसके स्वप्न थे, स्वयं के विचार थे, जिसके कारण सभी उससे प्रभावित थे |

एक दिन भील राजा अपने पुत्र Eklavya को बड़ी गंभीरता से देख रहे थे और विचार में थे | Eklavya उन्हें बहुत खोया- खोया और बैचेन दिखाई दे रहा था | अन्य बच्चो की तरह उसका मन बचपन की शरारतो में नहीं, बल्कि किसी उलझन में उलझा दिखाई दे रहा था | पिता, पुत्र Eklavya से इस गंभीरता का कारण पूछते हैं  | तब Eklavya अपने दिल की बात अपने पिता से कहता हैं – पिताजी ! मैं एक धनुर्धर बनना चाहता हूँ  और इसकी शिक्षा मैं गुरु द्रोंण से लेना चाहता हूँ | यह सुन पिता सोच में पड़ जाते हैं,उन्हें पता हैं कि गुरु द्रौण राज कुमारों को ही शिक्षित करते हैं और भील जाति को विद्या देना गुरु द्रोण के धर्म के विरुद्ध हैं | लेकिन Eklavya के मुख पर धनुर्धर बनने की जो प्रबल इच्छा थी उसके आगे पिता कुछ कह नहीं पाते और अपने पुत्र को गुरु द्रोण के पास जाने की आज्ञा दे देते हैं |

Eklavya बहुत उत्साह के साथ गुरुकुल की तरफ यात्रा शुरू करता हैं और कई तरह के स्वप्न और दृण संकल्प मन में लिए वो गुरु द्रोण के गुरुकुल पहुँचता हैं | उस समय द्रोणाचार्य हस्तिनापुर के राज कुमारों को शिक्षित कर रहे थे |

जब Eklavya गुरुकुल में प्रवेश करता हैं उसकी आँखे तेजी से गुरु द्रोण को ढूढती हैं उसने कभी द्रोण को देखा नहीं था लेकिन उसके अंतरपटल में उनकी एक विशेष छवि थी और वो उसी छवि को ढूंढता हैं | उसे आश्रम के प्रशिक्षण क्षेत्र में एक बालक के साथ गुरु दिखाई देते हैं जो उस बालक को धनुर्विद्या का पाठ सिखा रहे हैं | एक झलक में ही Eklavya को अहसास हो जाता हैं कि यही हैं उसके गुरु द्रोण जिनसे विद्या लेने वो अपने घर से इतना दूर आया हैं | Eklavya, गुरु द्रोण के समीप जाकर उन्हें प्रणाम करता हैं | एक अपरिचित चेहरे को देख गुरु द्रोण प्रश्न करते हैं, पूछते हैं – तुम ! कौन हो, जिसे मैंने कभी अपने आश्रम में नहीं देखा | Eklavya विनम्र भाव से हाथ जोड़कर उत्तर देता हैं – हे गुरु श्रेष्ठ ! मैं भील राजा का पुत्र Eklavya हूँ और आपसे धनुर्विद्या सिखने की इच्छा लिये बड़ी दूर से आया हूँ | द्रोण कहते हैं – तुम भील हो अर्थात शास्त्रों के नियमानुसार तुम एक शुद्र जाति के बालक हो, हे बालक ! मैं एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हूँ और शास्त्रानुसार, मैं केवल उच्च कुल अर्थात राज परिवार एवम ब्राह्मण के बालको को ही शिक्षा दे सकता हूँ और यही मेरा धर्म हैं,मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता, यह मेरे धर्म के विरुद्ध होगा | Eklavya को गुरु की बातों का बहुत गहरा आघात पहुँचता हैं उसे यह प्रथा एक असहनीय पीड़ा देती हैं , वो शीष झुकाये खड़ा रहता हैं | तब समीप खड़ा राजकुमार अपमानजनक शब्दों में Eklavya को वहाँ से जाने को कहता हैं | वह राजकुमार कोई और नहीं बल्कि अर्जुन था जो Eklavya से कहता हैं – क्या तुम्हे जातिगत नियमों का जरा भी ज्ञान नहीं, जो तुम गुरु श्रेष्ठ से विद्या सीखने की इच्छा लिये आये हो ? इस तरह अर्जुन Eklavya को आश्रम से अपमानित कर बाहर जाने का रास्ता दिखा देता हैं |

Eklavya भारी सा मन लिये आश्रम से बाहर निकल जाता हैं लेकिन उसके धनुर्धर बनने की इच्छा में लेशमात्र का भी परिवर्तन नहीं होता, बल्कि वो दृणता से अपने लक्ष्य को पाने के विचार में लग जाता हैं | अपने क्षेत्र में आकर वो जंगल के एक शांत स्थान को चुनता हैं, उसे स्वच्छ करता हैं, वहां गुरु द्रोण की एक भव्य प्रतिमा बनाता हैं और दिन प्रतिदिन उनकी पूजा कर धनुर्विद्या का अभ्यास करता हैं | अपनी लगन एवम गुरु के प्रति निष्काम श्रद्धा के कारण Eklavya की कला दिन प्रतिदिन निखरती जाती हैं  | वो एक महान धनुर्धर बनने की दिशा में आगे बढ़ता जाता हैं |

कुछ वर्षो बाद, एक दिन Eklavya जंगल में अभ्यास कर रहा था | तभी एक कुत्ता भौंकने लगता हैं, जो उसके अभ्यास में विघ्न डाल रहा था| पहले वो भौंकने की आवाज को नजरअंदाज करता लेकिन बहुत देर होने पर उसे गुस्सा आ जाता हैं  और वो अपना धनुष उठाकर कुत्ते की तरफ निशाना साधता  और बिना कुत्ते को आघात किये उसके मुँह में तीरों को इस तरह डाल देता हैं  कि कुत्ते का मुँह खुला रह जाता हैं लेकिन उसे जरा भी दर्द नहीं होता इस तरह उसका भौंकना बंद हो जाता हैं  |

उस समय उस वन में कुछ दुरी पर गुरु द्रोण के साथ सभी राजकुमार भी अभ्यास कर रहे थे | तब सभी की नजर उस कुत्ते पर पड़ती हैं  जिसे देख गुरु द्रोण आश्चर्यचकित रह जाते हैं  और उनके मन में यह जिज्ञासा उठती हैं  कि यह कौन महान धनुर्धर हैं जिसने इतने अच्छी तरह से इस कुत्ते का भौंकना बंद किया | द्रोण उससे मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं  और सभी के साथ वन में उस महान धनुर्धर की खोज में निकल पड़ते हैं  |
कुछ दुरी पर उन्हें Eklavya दिखाई देता हैं  जिसे वे पहचान नहीं पाते और पूछते हैं – क्या तुम वो धनुर्धर हो जिसने इस कुत्ते का भौंकना बंद किया ? Eklavya उसी विनम्रता से प्रणाम करते हुये हाँ में शीश झुकाता हैं | गुरु द्रोण कहते हैं – हे महँ शिष्य, मैं तुम्हारे गुरु से मिलना चाहता हूँ जिसने तुम्हे इस काबिल बनाया हैं | तब Eklavya शीष झुकाकर कहता हैं – मेरे महान आदरणीय गुरु का नाम गुरु द्रोण हैं | यह सुन द्रोण आश्चर्य से कहते हैं – यह कैसे संभव हैं ? द्रोण मेरा नाम हैं और मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूँ | Eklavya द्रोण को उनकी प्रतिमा दिखाता हैं और भूतकाल में हुई वो घटना याद दिलाता हैं – हे गुरुवर ! मैं वही भील बालक हूँ जो आपसे शिक्षा ग्रहण की इच्छा लिये गुरुकुल में आया था | तब आपने मुझे शुद्र कह कर मुझे ना कह दिया था लेकिन मेरी इच्छा प्रबल थी इसलिये मैंने आपकी प्रतिमा के सामने दिन प्रतिदिन आपको गुरु मान कर अभ्यास किया और एक धनुर्धारी बन सका | यह देख गुरु द्रोण के मन में बहुत ख़ुशी होती हैं लेकिन उनके अहम् को आघात भी पहुँचता हैं क्यूंकि उन्होंने यह प्रण लिया था कि वो अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धारी बनायेंगे और Eklavya के होते यह संभव नहीं | गुरु द्रोण अपने इस अपमान को सहन नहीं कर पाते |

तब गुरु द्रोण Eklavya से कहते हैं – तुमने शिक्षा तो प्राप्त कर ली, पर क्या तुम जानते हो, शिक्षा के बदले गुरु को गुरु दक्षिणा दी जाती हैं, क्या तुम मुझे गुरु दक्षिणा नहीं दोगे ? यह सुन Eklavya बहुत खुश होता हैं उसके लिए तो यही बड़ी बात थी कि गुरु द्रोण ने उसे अपना शिष्य कहा और वो कह देता हैं – हे गुरुवर यह मेरा धन्यभाग्य होगा, अगर मैं आपको शिष्य के रूप में गुरु दक्षिणा दे सकू, आप जो कहेंगे मैं आपको अवश्य दूंगा | द्रोण कहते हैं – एक बार सोच लो अगर तुम ना दे सके तो तुम्हारी विद्या व्यर्थ हो जायेगी | Eklavya कहता हैं – आप जो कहेंगे मैं प्राण देकर भी दूंगा | गुरु द्रोण बड़ी क्रूरता से कहते हैं – हे महान धनुर्धर ! मुझे गुरु दक्षिणा में तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिये जिसे सुन वहाँ खड़ा हर एक स्तब्ध रह जाता हैं क्यूंकि किसी धनुर्धारी से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांगना मतलब उससे उसकी शिक्षा लेने के बराबर ही था लेकिन गुरु द्रोण को अर्जुन को ही श्रेष्ठ बनाना था जो कि Eklavya के होते नहीं हो सकता था | Eklavya मुस्कुराते हुये अपने कमर में बंधे चाकू को निकालता हैं और बिना किसी विपदा के अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर अपने गुरु को गुरु दक्षिणा देता हैं | उसके ऐसा करते ही गुरु द्रोण को आत्मग्लानि होती हैं लेकिन वो अपने प्रण के आगे निष्ठुर बन जाते हैं | गुरु द्रोण आगे बढ़कर Eklavya के शीष पर हाथ रखते हैं और उसे आशीर्वाद देते हैं – पुत्र अंगूठा देने के बाद भी इतिहास के पन्नो में एक महान धनुर्धारी के रूप में तुम्हे जाना जायेगा  | तुम्हारी कथा हर एक मनुष्य के मुख पर होगी जब कोई गुरु दक्षिणा एवम गुरु निष्ठा की बात कहेगा !
इस तरह Eklavya अपने संकल्प के कारण बिना गुरु के भी एक महान धनुर्धर बनता हैं और अपनी गुरु निष्ठा एवम गुरु दक्षिणा के लिये जाना जाता हैं |

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